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लम्हों ने खता की और सदियों ने सजा पाई

मार्च 27, 2010

भारतीय स्वाधीनता दिवस १५-अगस्त. यह १५ अगस्त हर साल आता है. और हम सभी देशवासी गर्व से स्वंतंत्रता दिवस मनाते हैं. साथ ही बंटवारे की त्रासद घटना को भी याद करते हैं. किसी शायर (अभी नाम याद नहीं) की यह पंक्तिया “लम्हों ने खता की और सदियों ने सजा पाई” भारतीय इतिहास के इसी क्षण की बात कहता है. ये वो समय था जब बापू (महात्मा गांधी) अविभाजित भारत के सभी राजनीतिज्ञों के श्रधेय थे, गुरु थे. कांग्रेस पार्टी स्वाधीनता संग्राम में बढ़ चढ़ कर भाग लेने वाली सबसे बड़ी पार्टी के सदस्यों, देश के नीति निर्माणकर्ताओं और अन्य संघर्षशील समूहों के सामने कुछ प्रश्न बेचैनी बढ़ा रहे थे. बापू अब कैसे क्या किया जाना है?

द्विराष्ट्र सिद्धांत के प्रस्ताव पर फैसला होना था. हुआ भी, एक ख़ास धर्म और अल्पसंख्यकों के आजादी व कल्याण के विचारणार्थ(और किसी के स्वार्थपूर्ति) हेतु भारतीय उपमहाद्वीप पर “पाकिस्तान” नाम का भूखंड इस्लामिक मुल्क के मुहर के साथ अस्तित्व में आया और दूसरा शेष भारत जहाँ संप्रभुता के लिए “धर्म-निरपेक्षता” की कवायद पूरी हुई. विभाजन रेखा के आस पास और कुछ दूर दराज के इलाके के बाशिंदे (आम जन जो बाद में मुहाजिर शरणार्थी या कुछ और कहलाए) सोचते रह गए, उनके सपनो का आज़ाद देश कौन सा है. इधर से उधर और उधर से इधर या जो जहाँ रुकना चाहे रुक सकता है. बस यहीं पर लम्हों ने खता कर दी.

फिर भी मैं इस भूल को सबसे बड़ी भूल नहीं कह सकता. यदि गांधी, गांधीवादी और सेक्युलर समर्थकों ने धर्म निरपेक्षता की बात कही तो इसमें गलत क्या है. हर लोकतांत्रिक देश के नागरिक ऐसी ही व्यवस्था पसंद करेंगे. वैसे भी जिस देश में अतिथि देवो: भव:, सर्व धर्म समभाव की परंपरा रही है वहां एक धर्मावलम्बी बहुसंख्यकों की आस्था को सम्मान देते हुए एक तरफ़ा संविधान बनाना उचित नहीं था.

ख़ता तो सिर्फ इतनी हुई की प्रथम प्रधानमंत्री और प्रथम गृह मंत्री (उप-प्रधानमंत्री) नाम में अदल बदल हो गया. एक तरफ राष्ट्र का साहसी सेवक सरदार पटेल खड़े थे दूसरी तरफ विदेशी मेहमानों का सेवक नवाब नेहरु खड़े थे. एक तरफ अखंड भारत का सपना संजोये वीर और कूटनीति में माहिर लौह पुरुष सरदार पटेल खड़े थे तो दूसरी तरफ महाज्ञानी विश्व्यापी अंग्रेजी कालीन पर निवास करने के शौक़ीन हम बच्चो के चाचा नेहरु खड़े थे. गांधी जी धर्म संकट में थे. मुखिया किसे बनाया जाये, चाहते तो बापू अपने किसी बेटे को सत्ता की दौर में आगे रख सकते थे. लेकिन बापू तो सच्चे महात्मा थे उनके किसी बेटों में उन्हें सच्चे नेता की झलक न मिली, उनके नजदीकी में भी ऐसा कोई नहीं था जो इतने बड़े मुल्क की रहनुमाई कर सके. और जब सामने दो कर्मठ युग पुरुष जिन्ना और नेहरु मोर्चे पर खड़े हों तो किसी तीसरे को तभी सोचा जाये जब उसमे भी कुछ असाधारण बात हो. कुछ समय पूर्व से ही जब नेहरु परिवार बापू की व्यक्तिगत सेवा में जी जान से जुटा था. विशेषरूप से इंदिरा जी में गांधी जी को अनंत संभावनाए दिखती थी वह इस लिए की पिता के साथ रह कर इंदिरा ने भी बापू और देश की सेवा की थी. बापू अक्सर नेहरु से कहा करते थे अपनी बिटिया को राजनीति के ज्ञान देना.

आखिर वो कौन सी मजबूरी थी जो सदैव राष्ट्र हित में चिंतन करने वाले महात्मा को नेहरु के आगे झुकना पड़ा.

इंदिरा जो की माँ कमला की मृत्यु के बाद १९३६ से ही कांग्रेस में सक्रीय हो चुकी थी. उन्होंने वानर सेना का सफल नेत्रित्व भी किया था. अपने पिता की नज़र में एक गलती कर बैठी वो ये की अपने पत्रकार मित्र फीरोज़ खान से शादी की हठ करने लगी. फ़िरोज़ जिनके पिता जूनागढ़ के नवाब खान और माता एक पारसी महिला थी, नेहरु के सामने समस्या – ये शादी कैसे स्वीकार करे. मामला गांधी जे समक्ष रखा गया. बापू ने कहा इसमें कौनसी समस्या है, उसने फीरोज़ से मिलकर उसका नाम धर्म परिवर्तन करवा दिया “फीरोज़ गांधी”. वे नेहरु से बोले लो ये मेरा बेटा हो गया अब तो तुम अपनी बेटी की शादी इससे कर सकते हो. नेहरु जी ने कहा अब कोई दिक्कत नहीं है बापू.

व्यक्तिगत स्वार्थपूर्ति के लिए ये कैसी ख़ता हो गयी. जब वीर सरदार पटेल के हाथ में स्वर्ण भारत का भविष्य सौपना था वहां शासन एक ऐसे नवाबी परिवार के हाथ में आ गया, जो अब तक की सबसे बड़ी कांग्रेस पार्टी भी इसी परिवार के गुलाम बन कर रह गए. त्रासदी यही है की आज कोई भी कांग्रेसी नेता कितना भी बड़ा राष्ट्रवादी, ज्ञानी और सेक्युलर क्यूँ न हो सत्ता की बागडौर इस राज परिवार (गांधी ब्रांडेड नेहरु परिवार) से अपने  हाथ में नहीं ले सकता.

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10 टिप्पणियाँ leave one →
  1. मार्च 27, 2010 7:08 पूर्वाह्न

    aapne bahut achha likha hai…umeed hai aage aur bhi padhne ko milega…good work

  2. pranava saxena permalink
    मार्च 27, 2010 7:39 पूर्वाह्न

    “अगर जिन्ना को ही प्रधान मंत्री बना देते तो आज मुल्क का विभाजन नहीं होता पर नवाब नेहरू की ज़िद ने सब कुछ खराब कर दिया……..अच्छा लिखा आपने….”
    amitraghat.blogspot.com

  3. Parimal Kumar Jha permalink
    मार्च 27, 2010 9:13 पूर्वाह्न

    Dear Sulabh,
    Bahut kam log hain jo apni baat es bebaki se rakh pate hain. Tumhara Blog dil ko chhu gaya.

    Your
    Parimal

  4. मार्च 27, 2010 11:04 पूर्वाह्न

    nice

  5. मार्च 27, 2010 12:45 अपराह्न

    प्रथम प्रधानमंत्री और प्रथम गृह मंत्री (उप-प्रधानमंत्री) नाम में अदल बदल हो गया.

    लगता है यह सही हुआ वरना एक कश्मीर के सामने 565 रजवाड़े रख कर देखलो. नेहरू क्या हालत करते देश की.

  6. मार्च 27, 2010 1:23 अपराह्न

    बेंगाणी जी से सहमत, नेहरु के हाथ कश्मीर के साथ-साथ हैदराबाद जैसे निजाम भी लग जाते तो भारत कभी बन ही नहीं पाता… नेहरु की वजह से कश्मीर एक ही सिरदर्द है, वरना ऐसे 200 सिरदर्द होते… 🙂

  7. मार्च 27, 2010 3:03 अपराह्न

    बहुत अच्छी प्रस्तुति। सादर अभिवादन।

  8. Urmi permalink
    मार्च 28, 2010 5:12 पूर्वाह्न

    बहुत बढ़िया लिखा है आपने! उम्दा प्रस्तुती! बधाई!

  9. मार्च 29, 2010 6:20 अपराह्न

    Bahut Sateek likha hai Sulabh ji … shayad ishvar ko ye hi manzoor tha …

  10. E-Guru Rajeev permalink
    अप्रैल 9, 2010 1:22 अपराह्न

    बेंगाणी जी से सहमत, नेहरु के हाथ कश्मीर के साथ-साथ हैदराबाद जैसे निजाम भी लग जाते तो भारत कभी बन ही नहीं पाता… नेहरु की वजह से कश्मीर एक ही सिरदर्द है, वरना ऐसे 200 सिरदर्द होते… 😛

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