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हिंदी ब्लॉगजगत में कोई गुटबाजी नहीं है…

नवम्बर 18, 2009

जैसे पूरा हिन्दुस्तान विभिन्न कला-संस्कृति, बोल-चाल, रहन-सहन के आधार पर बंटा हुआ है. उसी प्रकार यह समूचा ब्लॉग-जगत भी है. मेरा अनुभव यही कहता है की यहाँ कोई
गुटबाजी नहीं है. ऐसा कुछ दिखना एक स्वाभाविक परिणति है. तेजी से बढती हुई ब्लोगेरों की भीड़ को हम एक जगह बांधकर नहीं रख सकते. कुछ बातें हिंदी ब्लॉगजगत के लिए संतोषजनक है जैसे, हिंदी में अधिकाधिक ब्लोगरों द्वारा नित्य हिंदी लेखन (काव्य, हास्य, व्यंग्य, ज्ञानवर्धक आलेख, यात्रा वृत्तांत, परिचर्चा या अन्य किसी भी विधा में हो) हो रहा है, हिंदी वेब टूल्स एवं सॉफ्टवेर अनुप्रयोगों का दिनोदिन विकास और विस्तार, विभिन्न राज्यों और देश विदेश में बैठे हिंदी-प्रेमियों के बीच बनता सामजिक और सरस  सम्बन्ध.

दुःख होता है जब कहीं किसी ब्लॉग पर सनसनी, गैरजरूरी मुद्दे और विवाद को बढाने वाली पोस्टे बहुतायत में सबका ध्यान खींचती रहती है. ये सब T.R.P. का मामला लग रहा है. हमलोग पहले से ही टेलीविजन मीडिया वाले से परेशान हो चुके थे ‘वे T.R.P. और नंबर 1 की दौड़ में कुछ भी पडोसने लग गए है.’ अब ब्लॉग जगत में भी कुछ स्थलों पर ऐसा  कुछ कुछ होने लगा है.

कुछ ब्लोगरो की पोस्ट इसलिए भी ज्यादा  पढ़ी जाती है की वे नेट पर ज्यादा सक्रिय हैं और अधिक समय व्यतीत करते हैं. इसमें किसी को आश्चर्य करने की कोई जरुरत नहीं है. अधिकाँश ब्लोगर स्वाभाविक हिट्स और सहज प्रतिक्रया प्राप्त कर आत्ममुग्धता के शिकार हो रहे हैं यह भी एक कारण है जरुरी बहस सम्पूर्ण नहीं हो पाती. यहाँ लेखक ही सम्पादक और प्रकाशक है इसकी जिम्मेदारी बहुत कम ब्लोगर समझते हैं. अपने लिए नए पाठक ढूंढने के बजाय कुछ ब्लोगर(प्रकाशक) अपनी पोस्ट पर टिपण्णी देने के लिए निरंतर आग्रह ईमेल करते हैं यह जानते हुए भी की सभी की अपनी पसंद अलग है और ब्लॉग लिखने, पढने और कमेन्ट के लिए सबके पास समय भी एक सामान नहीं है. ईमेल फीड की सुविधा सभी ब्लॉग पर पहले से ही उपलब्ध होती है. सुधि पाठक इसका लाभ उठाते हैं. इसलिए यह सोचना गलत है की मेरे छापे को पाठक नहीं पढ़ते हैं.

यहाँ विचार सम्प्रेषण के बहुत सारे माध्यम टेक्स्ट, ग्राफिक्स, ऑडियो, विडियो, साक्ष्य में पहले से उपलब्ध दस्तावेज, वेब कड़िया आदि होने के बावजूद भी समय का अभाव है. पाठक भी कम समय में ज्यादा से ज्यादा चीज़े बटोरना चाहते हैं. इन सब गहमा गहमी में नए ब्लोगर परेशान हो जाते हैं. कभी कभी तो मुझे लगता है जो एग्ग्रीगेटर ब्लॉग पोस्टो को पाठक से मिलवाने का एक उत्तम कार्य प्रतिदिन, प्रतिक्षण निष्पादन करती है, उन्ही के कुछ टूल्स दिग्भ्रमित भी करते है. जैसे ब्लोगवाणी पसंद चटका टूल, चिट्ठाजगत सक्रियता क्रमांक टूल,  फ़ोलोवर्स की फेहरिश्त(including thumb view picture), हिट्स और कमेंट्स काउंटर इत्यादि. इन सबने मिलकर ब्लोगर की विविधता और मौलिक प्रस्तुति पर नियमन सा लगा दिया है. फलस्वरूप नए उत्साही लेखक/ब्लोगर पूर्वाग्रह से ग्रस्त हो रहे हैं. कहीं कहीं पुराने सक्रिय ब्लोगरों पर गुटबाजी का आरोप लगाते हैं. कुछ ब्लोगर अपनी सहज मौलिक सोच को सीधे सीधे प्रस्तुत करने से स्वयं को रोकते हैं. जबकि ब्लोगिंग लेखन के लिए सबसे आज़ाद जगह है. यहाँ प्रस्तुतीकरण का कोई नियम नहीं है. हाँ असामाजिक और गैर जिम्मेदाराना व्यवहार कोई पसंद नहीं करता. इन्टरनेट के यूजर्स/पाठक जागरूक हैं वे फ़ौरन सबक सिखा देते हैं. ब्लोगिंग कोई खेल नहीं है यह समझना होगा.

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3 टिप्पणियाँ leave one →
  1. नवम्बर 19, 2009 6:00 अपराह्न

    प्रिय सुलभ जी ,
    पिछली बार आया था तो सिर्फ पढ़ा था काफी कुछ .ज्यादा कह नहीं पाया था .फुर्सत नहीं थी कह कर खुद को व्यस्त दिखाना ,आप जैसे स्नेहियों के लिए प्रयोग नहीं कर सकता ,भले बात सही ही हो.

    आपका यह आलेख जरूरी था .इस बात को कहने के लिए साह्स भी चाहिए जो की कभी कभी किसी को अप्रिय भी लग सकती है.लेकिन आपने इतने सलीके से कहा है की रंजिश या अप्रियता की गुंजाईश नहीं .
    आपसे मैं सहमत हूँ.
    उम्मीद है की आगे भी ऐसे ही सार्थक लेखन मिलेंगे आपसे .

  2. मार्च 29, 2010 4:47 अपराह्न

    हर दुसरे दिन मैं यहाँ पढता हूँ कि ब्लौगजगत में गुटबाजी से लोग घुटे जा रहे हैं. वस्तुतः, इन बातों को आयेदिन कहने वाले लोगों का ही एक गुट है जो एक-दूसरे को हवा देते रहते हैं. कुछ नए ब्लौगर इनके लपेटे में आकर दनादन ऐसी विषयक पोस्टें ठोंकने लगते हैं. यह सब लोगों का ध्यान अच्छी पोस्टों से भटका देता है.

  3. मार्च 31, 2010 10:30 पूर्वाह्न

    बहुत अच्छी पोस्ट !
    १-अधिकाँश ब्लोगर स्वाभाविक हिट्स और सहज प्रतिक्रया प्राप्त कर आत्ममुग्धता के शिकार हो रहे हैं यह भी एक कारण है जरुरी बहस सम्पूर्ण नहीं हो पाती.
    २-दुःख होता है जब कहीं किसी ब्लॉग पर सनसनी, गैरजरूरी मुद्दे और विवाद को बढाने वाली पोस्टे बहुतायत में सबका ध्यान खींचती रहती है. ये सब T.R.P. का मामला लग रहा है
    ३- इन सबने मिलकर ब्लोगर की विविधता और मौलिक प्रस्तुति पर नियमन सा लगा दिया है. फलस्वरूप नए उत्साही लेखक/ब्लोगर पूर्वाग्रह से ग्रस्त हो रहे हैं.
    ४-यहाँ लेखक ही सम्पादक और प्रकाशक है इसकी जिम्मेदारी बहुत कम ब्लोगर समझते हैं. अपने लिए नए पाठक ढूंढने के बजाय कुछ ब्लोगर(प्रकाशक) अपनी पोस्ट पर टिपण्णी देने के लिए निरंतर आग्रह ईमेल करते हैं यह जानते हुए भी की सभी की अपनी पसंद अलग है और ब्लॉग लिखने, पढने और कमेन्ट के लिए सबके पास समय भी एक सामान नहीं है.
    ५-. कुछ बातें हिंदी ब्लॉगजगत के लिए संतोषजनक है जैसे, हिंदी में अधिकाधिक ब्लोगरों द्वारा नित्य हिंदी लेखन (काव्य, हास्य, व्यंग्य, ज्ञानवर्धक आलेख, यात्रा वृत्तांत, परिचर्चा या अन्य किसी भी विधा में हो) हो रहा है, हिंदी वेब टूल्स एवं सॉफ्टवेर अनुप्रयोगों का दिनोदिन विकास और विस्तार, विभिन्न राज्यों और देश विदेश में बैठे हिंदी-प्रेमियों के बीच बनता सामजिक और सरस सम्बन्ध.
    …………..तार्किक और व्यावहारिक पोस्ट !
    इस पर प्रारम्भ में मैंने एक व्यंग्य लिखा था उसे भी पढ़ें -http://padmsingh.wordpress.com/2010/01/13/%E0%A4%95%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%82%E0%A4%9F%E0%A4%B0-%E0%A4%AC%E0%A4%BE%E0%A4%AC%E0%A4%BE-2/

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